राष्ट्र के लिए जिए, राष्ट्र के लिए मरे...

राष्ट्र के लिए जिए, 
राष्ट्र के लिए मरे, 
साधना के बन प्रदीप, 
अंधकार को हरे || धृ ||

दीप क्या जो अंधकार, दूर भी न कर सके,
शक्ती क्या जो दुष्टता को, चूर भी न कर सके,
वह घनावली नही, जो वृष्टी भी न कर सके,
वह नही महीपती, जो सृष्टी भी न कर सके,
चेतना के सुप्त रूप, वीरता के मौनरूप, 
जाग जाग जाग रे, जाग जाग जाग रे ||१||

क्या खिला वसंत, कोकिला मधुर न गा सके,
क्या खिले सुमन, की भृंग गंध भी न पा सके,
क्या बही नदी, की प्यास भी न जो बुझा सके,
क्या चला पथीक, की थाह राह भी न पा सके,
यह नहीं शयन समय, युवक समूह जागरे,
जाग जाग जाग रे, जाग जाग जाग रे ||२||

वह उदित हुआ है सूर्य, अंधकार कर विदीर्ण,
और वह पवन चला, जो बादलोके वक्ष चीर,
खिल गये सरोवरोमे, सैकडो कनक कमल,
मच गयी तरंग से सुरंग मे चहल पहल,
हो गयी निशा विदीर्ण, कर्मवीर जाग रे,
जाग जाग जाग रे, जाग जाग जाग रे ||३||

Comments

Popular posts from this blog

इधर उधर बिखरे सुमनोंसे कि यह गुरुपूजा

जवान का निशान है, ये हाथ में मशाल...